Friday, June 11, 2010

ज़िन्दगी ने हरा दिया

मुझे मौत तो न मिटा सकी पर ज़िन्दगी ने हरा दिया मुझे जीते जी ही मौत का अहसास तुम ने करा दिया
मेरे ख्वाब के जो महल थे मैं चला था उन की तलाश में मैंने राह-ए-मन्ज़िल छोड़ दी कि हकीकतों ने डरा दिया

तुम भूल गये मेरे प्यार को मुझे ये ही गम कुछ कम न था रुसवाई से तुम्हें क्या मिला मुझे क्यों नज़र से गिरा दिया
ज़फ़ाओं की फ़हरिस्त भी मेरे यार की कुछ कम नहीं उस ने मेरी वफ़ाओं का ईनाम कैसा खरा दिया

'' रितेश '' का ऐ वक्त यूं तो उम्र भर तड़पा करेगा मेरा दिल दुनिया की नज़रों में खलिश मेरा ज़ख्म तूने भरा दिया.

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