Monday, December 6, 2010

मुझे नहीं आता कोरे स्वप्न सजाना,


मुझे नहीं आता कोरे स्वप्न सजाना,
मैं अपने मन की देखी साकार करूंगा.

माना यह,हर एक कल्पना सत्य न होती,

हर अभिलाषा पूरी हो पाती कब है ?

चारो ओर अबरोध खड़े है भांति भांति के,
हर पगडण्डी मंजिल तक जाती कब है ?


लेकिन
"
रितेश " को नहीं आता आधे में रुक जाना,
निकल पड़ा हूँ तो आसा है की बाधाये पार कर ही लूँगा.

Monday, November 29, 2010

सत्य के लिए तुम न अब.. लड़ा करो


सत्य के लिए तुम न अब.. लड़ा करो
मत मोढो घुटने ,चादर को बढ़ा. करो

तुम्हे क्या दिया. सिद्धांत और धर्म ने अपने कायदे दूसरों पर मत मढ़ा करो

सत्य..... परेशान होता,पराजित नही .. खोखली बातों के लिए मत अड़ा करो

यूँ तो जिन्दगी भर.. नही तोड़ पाओगे मटकी, तुम किसी के कंधे पे चढ़ा करो

पास होने की सिर्फ अंकसूची भर चाहिए .. कैसे पास हुए सवाल यह मत खड़ा करो

दूसरों के लिए लढना रोना छोड़ दो अब जीना है तो दिल अपना भी कड़ा करो

बहुमत के साथ चलना सीख लों ,"रितेश" बे- फायदे की बहस में ..मत पड़ा करो

Wednesday, November 3, 2010

मैं अकथ्य को कहने का अभ्यास कर रहा हूं।


मैं अकथ्य को कहने का अभ्यास कर रहा हूं। नए कोर्स की कठिन परीक्षा पास कर रहा हूं। हूक उठे मन में तो उस पर काबू पा लेता, यादें तंग करें तो आंखों को रिसने देता, लोगों से मिलता हूं मस्ती की मुद्राओं में भीतर पूरा कवि हूं, बाहर पूरा अभिनेता, जल में हिम-सा बहने का अभ्यास कर रहा हूं। आंसू पी न सकूं, निर्जल-उपवास कर रहा हूं। निपट अकेले रोने से जी हल्का होता है, कोई नहीं पूछने-वाला तू क्यों रोता है, ये, वे पल हैं, जो नितान्त मेरे-अपने पल हैं यहां मौन ही अब मेरी कविता का श्रोता है, घर से बाहर रहने का अभ्यास कर रहा हूं। ऐसा लगता है, जैसे कुछ खास कर रहा हूं। दीवारों में रहता हूं, घर में वनचारी हूं, अब मैं सचमुच ऋषि कहलाने का अधिकारी हूं, मेरे सर-पर-का बोझा जो लूट ले गया है मैं अपने अंतरतम से उसका आभारी हूं, " रितेश " दुख को, सुख से सहने का अभ्यास कर रहा है । सागर-डूबी धरती को आकाश कर रहा हूँ।..!!!!!

Tuesday, October 19, 2010

पिघलता है दिल मेरा


"पिघ..लता था जब साँझ का संदली बदन..

छू कर निकलती थी जब मुझे आवारा पवन


जाने किसके स्पर्श का आकांशी हो उठता था मेरा मन..

मिलने पर तुम्हारे, लगा...

तुम ही हो वो शीतल घन...

जिसका बरसों से
आकांशी था

मेरा मन..." रितेश "

Thursday, September 9, 2010

किताबो के पन्नो को पलट के सोचता हूँ

कितबो के पन्नो को पलट के सोचता हूँ यूं पलट जाये मेरी ज़िन्दगी तो क्या बात है
ख्वाबों में रोज मिलते है जो अगर हकीकत में आ जाये तो क्या बात है कुछ लोग मतलब के लिए धुन्द्ते है मुझको बिन मतलब जो आये तो क्या बात है कतल कर के तो सब ले जायेंगे दिल मेरा कोई बातों से ले जाये तो क्या बात है जो शरीफों की शराफत में यह बात ना हो एक शराबी कह जाये तो क्या बात है अपने रहने तक तो ख़ुशी दूंगा ही सबको जो रितेश के मौत पे कोई दुखी हो जाये तो क्या बात है

Monday, August 16, 2010

आँसू में ना ढूँदना हूमें,


आँसू में ना ढूँदना हूमें,दिल में हम बस जाएँगे,तमन्ना हो अगर मिलने की,तो बंद आँखों मैं नज़र आएँगे.लम्हा लम्हा वक़्त गुजर जाएँगा,चँद लम्हो में दामन छूट जाएगा,आज वक़्त है दो बातें कर लो हमसे,कल क्या पता कौन आपके ज़िंदगी में आ जाएगा.पास आकर सभी दूर चले जाते हैं,हम अकेले थे अकेले ही रह जाते हैं,दिल का दर्द किससे दिखाए,मरहम लगाने वाले ही ज़ख़्म दे जाते हैं,वक़्त तो हमें भुला चुका है,मुक़द्दर भी ना भुला दे,दोस्ती दिल से हम इसीलिए नहीं करते,क्यू के डरते हैं,कोई फिर से ना रुला दे,ज़िंदगी मैं हमेशा नये लोग मिलेंगे,कहीं ज्यादा तो कहीं काम मिलेंगे,ऐतबार ज़रा सोच कर करना,मुमकिन नही हर जगह तुम्हे हम मिलेंगे।खुशबू की तरह आपके पास बिखर जाएँगे,शुकुन बन कर दिल मे उतर जाएँगे,महसूस करने की कोशिश तो कीजिए,दूर होते हुए भी '' रितेश '' पास नजर आएँग

Monday, August 9, 2010

कुछ दूर हमारे साथ चलो


कुछ दूर हमारे साथ चलो ,हम अपनी कहानी कह देंगे ॥,
समझे न जिसे तुम आँखों से, वो बात ज़ुबानी कह देंगे॥!! "..... कौन है ...??कौन है जो एक साए की तरहमेरे दिल को छूती हुई गुज़र जाती है...कभी पास से कभी दूर से..??एक आवाज़ ... एक नगमा ...एक गीत बन कररग -रग मे उतर जाती है...कभी पास से कभी दूर से..!!कौन है जो मुझको अपनी तनहाई का एहसास दिला जाती है ..एक खालीपन .. सूनापन छोड़ जाती है ......??मैं उसे देखना चाहता हूँ ...जानना चाहता हूँ ...उँगलियों से उसके चहरे को छूना चाहता हूँ ...!!कौन है जो पास रहकर भी मुझसे दूर है ....??कभी पास से कभी दूर से ...??कौन है जो पास रहकर भी मुझसे दूर है ....क़दमों की आहट सुनता हूँ , पलट कर उसे देखता हूँ ....तस्वीर बन जाता हूँ । ।बेखुद हो जाता हूँ ....!!कौन है जो " रितेश " के दिल को साए की तरह छूती हुई गुज़र जाती है ...??

Monday, July 19, 2010

बड़ी बात है


द्वन्द्व को पार करना बड़ी बात है अपने दुख से उबरना बड़ी बात है
जंगलों-जंगलों, पर्वतों-पर्वतों गंध बनकर बिखरना बड़ी बात है

रूप में अपनी परछाई को देखकर दर्पनों का सँवरना बड़ी बात है

लोग नासूर कह कर डराने लगे उन दिनों, घाव भरना बड़ी बात है
अपने आतंक के राज्य को त्याग कर सिरफिरों का सुधरना बड़ी बात है
शेर सुन कर समझने का दावा कर शायरी में उतरना बड़ी बात है
" रितेश " कहते है अपनी सीमा को पहचान कर भी कभी अपनी हद से आगे गुज़रना बहुत बड़ी बात है.

Sunday, July 18, 2010

चाँद उतरा


जब मेरा हर ज़ख़्म गहरा हो गया दर्द से पुरनूर चेहरा हो गया एक क़तरे का करिश्मा देखिए इस कदर तड़पा के दरिया हो गया शाम के काँधे पे सूरज क्या झुका सारी दुनिया में अँधेरा हो गया चाँद उतरा जब हमारे सहन में चाहतों का रंग सुन्हेरा हो गया जब थके-माँदों को नींद आने लगी एक झपकी में सवेरा हो गया ज़िन्दगी ज़हरीली नागिन है इस के पीछे " रितेश " तू क्यूँ सँपेरा हो गया...

Saturday, July 3, 2010

मेरा संसार


पतझड़ हो गया मेरा संसार जब से तूने छोड़ दिया है साथ ना जाने क्या भूल हुई जब से तू है गई मेरी जिंदगी मुझसे दूर हुई तेरे बगैर सब कुछ अधूरा है ये गाँव , घर, ये आँगन ये नदी का किनारा, वो बगीचा अब इस आम पर कोयल नहीं आती उसका वो मधुर कलरव चीख बन गया है अब जब से तू है गई ... बगिया में नहीं खिला कोई गुलाब माटी की वो सौंधी खूशबू कहाँ खो गई तेरे जाने से खुशियाँ मुझसे जुदा हो गई अब नहीं बजती मंदिर में घंटियाँ सुनाई देती है हर जगह दर्द की चीख हर कोई दुखी है मेरे दर्द में और ना सता, अब आजा तू बन के बहार उड़ेल दे आँचल से मेरे जीवन में प्यार कर फिर से वो सोलह श्रृंगार कि आ जाए फिजाओं में बहार बुला ले उस कोयल को जो मधुर गीत है गाती रख दे '' रितेश '' की आँखों पे हथेली आजा सामने तू हँसती मुस्कुराती।

Monday, June 28, 2010

आज रात


'' रितेश ''प्यार को प्यार से अब एक हसीं मोड़ दो आज रात, मेरे जिस्म में अपनी रूह छोड़ दो !

परवाह न करो,मान लो मेरे इकरार की जि़द हर रस्म और हर कसम आज सब तोड़ दो !
फिर मिले न मिले.क्या भरोसा ओ मेरे सनम आज मेरे बदन में तुम कोई. निशानी छोड़ दो !

जितने प्यासे हो तुम उतने ही प्यासे.. है हम कोरी चादर पे सुहाग का सिन्दूरी रंग छोड़ दो !
तन मन और जीवन सब है तुम्हारे हवाले.अब सोलह सावन से कुवांरी. साँसों का व्रत तोड़ दो !
दो बदन यूँ मिले,अब साँसों का भी फासला न हो आगोश में छुपा लो, इक रूह से दो बदन जोड़ दो
झुमके- कंगन, चुढ़ी पायल यह तो जेवर हें बस गहना अनमोल तो नथ है लो इसे भी तोड़.. दो !
सजन तुम्हारी वासना मेरी जन्मो की है उपासना स्वीकार कर के मुझे प्रेम की समाधि से जोड़ दो !
आत्मा से लिए हमने सात फेरे और सातों वचन घर की देहलीज पर शगुन का ''रितेश ''श्री -फल फोड़ दो

Tuesday, June 15, 2010

दुनिया के रास्ते मे कहाँ खो गये


दुनिया के रास्ते मे कहाँ खो गये ऐसे जब जब खुद के रास्ते बनाने निकले || ले चिराग रौशनी बन बैठे दूर तक खुद क्या पता जब रौशनी ही बुझाने निकले || ना दरिया का पता था ना समुंदर का जब जब राहे चमन को सजाने निकले || फकत इतना ही रहा जो अफ़सोस रहेगा आग थी चाँद पर जमीं पर बुझाने निकले || रोता हूँ आज भी तेरे प्यार मे "आरती " तेरे प्यार के किस्से माकूल सुनाने निकले || डूब गये चाँद सितारे इस कदर से देखो '' रितेश '' की लाश भी मिली नही अस्थियाँ बहाने निकले ||

Monday, June 14, 2010

बीच मंझधार


लहरों ..मुझे ले चलों ... बीच मंझधार .. मैं फिर ...लौट के न आऊ इस पार किनारा बन तुम - रहना सुदृढ़ ...सदा स्थिर और स्थित दूर से निहारूंगा तुम्हें मैं हिचकोले खाता खारे जल सा बिन नाव ..बिन पतवार चाहा था बस मैंने तुमसे कुछ मीठे बोल और पुरवाई संग घुला तुम्हारा शीतल प्यार इतना भी न मिल सका मुझे बन गया थपेड़ो कों सहता मेरा जीवन स्वयं एक भार अब मेरे भटकते आशान्त मन कों सह रहा ....यह भीषण पारावार सोचता शांत चित्त हो जाऊ पर एक तिनका तक न मिलता मुझे बह रहा व्यर्थ ही मैं वक्त का यह कैसा -निर्मम प्रहार लहरों ..'' रितेश '' को ले चलों ... बीच मंझधार .. मैं फिर ...लौट के न आऊ इस पार

नीम के पेड़


मेरे घर के बहार नीम के पेड़ की पत्तियां लहरा रहीं है
सम्वेदनाओ की भाषा में वे मुझको बहला रही हैं ,
कहती हैं कुछ देर आओ
इस मातृत्व की छायाँ में समां जाओ
हमारे पुत्र पुत्रियाँ तो जाने कहाँ होंगे
तुम तो सामने हो ,
कुछ देर हमें भी गले लगा जाओ
इतने प्रेम को में नकार न सका
किसी और को में पुकार न सका
ली चारपाई और उसके आगोश में समां गया
कड़ी धुप थी पर मुझपर उसके प्रेम का साया छ गया ..
तुम भी देख लो इधर उधर कोई तुम्हे भी बुला रहा है
में तो आनंद ले रहा हूँ ,विनती है ''रितेश'' का आप भी आनंद लें ....

Sunday, June 13, 2010

तेरी उल्फत


बात चली तेरी आँखों से, जा पहुंची पैमाने तक,
खींच रही है तेरी उल्फत, आज मुझे मैखाने तक,

इश्क कि बातें, गम कि बातें, दुनिया वाले करते हैं,
किसने शम्मा का दुःख देखा, कौन गया परवाने तक,

इश्क नहीं है तुमको मुझ से सिर्फ बहाने करती हो,
यूँ ही बहाने कायम रखना, तुम मेरे मर जाने तक,

इतना ही कहना है '' रितेश '' का तुमसे मुमकिन हो तो,
जाना ही गए तो रुकना होगा, आँखों के पथराने तक..

Saturday, June 12, 2010

उनको एक पत्र लिखता हूं


मैं हर दूसरे छण उनको एक पत्र लिखता हूं मगर सभी कागज पर नहीं उतरते, सच , यह मेरी बड़ी से बड़ी पीड़ा है
कि जिनको मैं अतिशय प्रेम करता हूं वो इसी कारण ''रितेश'' को पागल समझते है!
कदम कदम पर बहारो ने साथ छोड दिया, पडा जब वक़्त तो अपनो ने साथ छोड दिया, कसम खाई थी इन सितारो ने, साथ देने की, सुबह होते ही सितारो ने भी साथ छोड दिया,
पीने बैठा हूँ ,पीये जा रहा हूँ ... न कोई मकसद है न इरादा है .... जब याद तेरी आई तो इतना होश कहाँ कि कम है कि ज्यादा है.

Friday, June 11, 2010

ज़िन्दगी ने हरा दिया


मुझे मौत तो न मिटा सकी पर ज़िन्दगी ने हरा दिया मुझे जीते जी ही मौत का अहसास तुम ने करा दिया मेरे ख्वाब के जो महल थे मैं चला था उन की तलाश में मैंने राह-ए-मन्ज़िल छोड़ दी कि हकीकतों ने डरा दिया तुम भूल गये मेरे प्यार को मुझे ये ही गम कुछ कम न था रुसवाई से तुम्हें क्या मिला मुझे क्यों नज़र से गिरा दिया ज़फ़ाओं की फ़हरिस्त भी मेरे यार की कुछ कम नहीं उस ने मेरी वफ़ाओं का ईनाम कैसा खरा दिया '' रितेश '' वक्त यूं तो उम्र भर तड़पा करेगा मेरा दिल दुनिया की नज़रों में खलिश मेरा ज़ख्म तूने भरा दिया.

ज़िन्दगी ने हरा दिया

मुझे मौत तो न मिटा सकी पर ज़िन्दगी ने हरा दिया मुझे जीते जी ही मौत का अहसास तुम ने करा दिया
मेरे ख्वाब के जो महल थे मैं चला था उन की तलाश में मैंने राह-ए-मन्ज़िल छोड़ दी कि हकीकतों ने डरा दिया

तुम भूल गये मेरे प्यार को मुझे ये ही गम कुछ कम न था रुसवाई से तुम्हें क्या मिला मुझे क्यों नज़र से गिरा दिया
ज़फ़ाओं की फ़हरिस्त भी मेरे यार की कुछ कम नहीं उस ने मेरी वफ़ाओं का ईनाम कैसा खरा दिया

'' रितेश '' का ऐ वक्त यूं तो उम्र भर तड़पा करेगा मेरा दिल दुनिया की नज़रों में खलिश मेरा ज़ख्म तूने भरा दिया.

Wednesday, June 9, 2010

मेरा गाँव


जो हमसे पहले आये थे अब वो ही बाशिंदें नही रहे
मेरे गाँव शहर में अब परिंदे नही रहे
आदम जात की फितरतों ने घोल दिया हवाओं में जहर मेरे पितरो (पितृ देवता )के पुरखे पीपल और बरगद भी जिन्दा नही रहे हर अमावस और उनकी तिथियों पर देता हु नियमित अर्ध्य उस जल में भी अमृत तत्व शेष नही रहे .. अब बेमानी रूडिवादी लगती है वट वृक्ष की पूजा अब तुलसी वाले आँगन ही नही रहे . गो धूलि बेला में पनिहारिनों के लोकगीत सुनाई नही पढ़ते पनघट ..पर अब परियों के जमघट नही रहे मल्लाह का आलाप सुनने को तरसते है कान .. कंहा है ..अब ग्वाले की ? ठेठ देशी तान वो सावन के झूले ..वो साँझा चूल्हे रात भर आती मंदिर से ढोलक हारमोनियम के स्वर गम्मत(भजन मंडली ) वाले भी '' रितेश '' कंहा रहे

Tuesday, June 8, 2010

ख़ामोश समंदर


क्यूँ है ख़ामोश समंदर तुम्हें मा’लूम है क्या कितने तूफ़ान हैं भीतर तुम्हें मा’लूम है क्या
उससे मिलने की तमन्ना है अगर मिल जाए कौन लिखता है मुक़द्दर तुम्हें मा’लूम है क्या

एक जुमला वो जो कल तुमने कहा था, उसने
ख़ून से रँग दिए ख़ंजर तुम्हें मा’लूम है क्या

दर्द कितना भी दो आँसू नहीं आने वाले दिल मेरा हो गया पत्थर तुम्हें मा’लूम है क्या

डूब जाता है उन आँखों में उतरने वाला उसकी आँखें हैं समंदर तुम्हें मा’लूम है क्या

हम दिखावे की मुहब्बत नहीं करते तुमसे जान कर देंगे निछावर ''रितेश '' मा’लूम है क्या

Monday, June 7, 2010

हर रात एक नाम याद आता है


हर रात एक नाम याद आता है कभी सुबह कभी शाम याद आता है, जब सोचता हूँ कर लू दूसरी मोहब्बत फ़िर पहली मोहब्बत का अंजाम याद आता है!
सजा मिली है उनसें दूर रहने की ये बात नही है किसी और से कहने की, हम तो रह लेंगे उनके बिना भी,पर इन आशुओ को आदत है,उनकी याद में बहने की!

साथ छोड़ के कभी हमसे जुदा मत होना वफ़ा चाहिए तुमसे,बेवफा मत होना, रूठे चाहे सारी दुनियाँ हमसे,पर दोस्त तुम कभी खफ़ा मत होना!

रोयेंगी ये आँखे मुस्कराने के बाद आएगी रात दिन ढल जाने के बाद, कभी रूठना ना मुझसे मेरे दोस्त शायद ये जिन्दगी ना रहे तेरे रूठ जाने के बाद!

रह-रह के उनकी याद सताए तो क्या करे उनकी याद दिल से ना जाए तो क्या करे, सोचा था ख्वाबों में मुलाकात होगी,लेकिन ''रितेश''जब नींद ही ना आए तो क्या करे!

Sunday, June 6, 2010

सापनो की सौगात लिखूँ


कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखू या सापनो की सौगात लिखूँ ॰॰॰॰॰॰

मै खिलता सुरज आज लिखू या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ ॰॰॰॰॰॰

वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सान्स लिखूँ

वो पल मे बीते साल लिखू या सादियो लम्बी रात लिखूँ

मै तुमको अपने पास लिखू या दूरी का ऐहसास लिखूँ

मै अन्धे के दिन मै झाँकू या आँन्खो की मै रात लिखूँ

मीरा की पायल को सुन लुँ या गौतम की मुस्कान लिखूँ

बचपन मे बच्चौ से खेलूँ या जीवन की ढलती शाम लिखूँ

सागर सा गहरा हो जाॐ या अम्बर का विस्तार लिखूँ

वो पहली -पाहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँ

सावन कि बारिश मेँ भीगूँ या आन्खो की मै बरसात लिखूँ

गीता का अॅजुन हो जाॐ या लकां रावन राम लिखूँ॰॰॰॰॰

मै हिन्दू मुस्लिम हो जाॐ या बेबस ईन्सान लिखूँ॰॰॰॰॰

मै ऎक ही मजहब को जी लुँ ॰॰॰या मजहब की आन्खे चार लिखूँ॰॰॰


कुछ जीत लिखू या हार लिखूँ '' रितेश ''

या दिल का सारा प्यार लिखूँ