
जलते रहे जिनके लिए हम रौशनी बनकर
वो शख्स भी मिला मुझे तो अजनबी बनकर
फरेब जब भी पाया तो पाया है आशनाई मे
कभी वफा बनकर तो कभी दोस्ती बनकर
ता-उमर समझते रहे जिसे हमसफ़र अपना
वो मौत भी बेवफाई कर गयी जिन्दगी बनकर
मंसब नशीन हुए लोग हिन्दू-मुसलमान बनके
मै तो कही का ना रहा" रितेश "आदमी बनकर
No comments:
Post a Comment