'' रितेश ''प्यार को प्यार से अब एक हसीं मोड़ दो आज रात, मेरे जिस्म में अपनी रूह छोड़ दो !
परवाह न करो,मान लो मेरे इकरार की जि़द हर रस्म और हर कसम आज सब तोड़ दो !
फिर मिले न मिले.क्या भरोसा ओ मेरे सनम आज मेरे बदन में तुम कोई. निशानी छोड़ दो !
जितने प्यासे हो तुम उतने ही प्यासे.. है हम कोरी चादर पे सुहाग का सिन्दूरी रंग छोड़ दो !
तन मन और जीवन सब है तुम्हारे हवाले.अब सोलह सावन से कुवांरी. साँसों का व्रत तोड़ दो !
दो बदन यूँ मिले,अब साँसों का भी फासला न हो आगोश में छुपा लो, इक रूह से दो बदन जोड़ दो
झुमके- कंगन, चुढ़ी पायल यह तो जेवर हें बस गहना अनमोल तो नथ है लो इसे भी तोड़.. दो !
सजन तुम्हारी वासना मेरी जन्मो की है उपासना स्वीकार कर के मुझे प्रेम की समाधि से जोड़ दो !
आत्मा से लिए हमने सात फेरे और सातों वचन घर की देहलीज पर शगुन का ''रितेश ''श्री -फल फोड़ दो
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