
मेरे घर के बहार नीम के पेड़ की पत्तियां लहरा रहीं है
सम्वेदनाओ की भाषा में वे मुझको बहला रही हैं ,
कहती हैं कुछ देर आओ
इस मातृत्व की छायाँ में समां जाओ
हमारे पुत्र पुत्रियाँ तो जाने कहाँ होंगे
तुम तो सामने हो ,
कुछ देर हमें भी गले लगा जाओ
इतने प्रेम को में नकार न सका
किसी और को में पुकार न सका
ली चारपाई और उसके आगोश में समां गया
कड़ी धुप थी पर मुझपर उसके प्रेम का साया छ गया ..
तुम भी देख लो इधर उधर कोई तुम्हे भी बुला रहा है
में तो आनंद ले रहा हूँ ,विनती है ''रितेश'' का आप भी आनंद लें ....
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