Thursday, September 9, 2010

किताबो के पन्नो को पलट के सोचता हूँ

कितबो के पन्नो को पलट के सोचता हूँ यूं पलट जाये मेरी ज़िन्दगी तो क्या बात है
ख्वाबों में रोज मिलते है जो अगर हकीकत में आ जाये तो क्या बात है कुछ लोग मतलब के लिए धुन्द्ते है मुझको बिन मतलब जो आये तो क्या बात है कतल कर के तो सब ले जायेंगे दिल मेरा कोई बातों से ले जाये तो क्या बात है जो शरीफों की शराफत में यह बात ना हो एक शराबी कह जाये तो क्या बात है अपने रहने तक तो ख़ुशी दूंगा ही सबको जो रितेश के मौत पे कोई दुखी हो जाये तो क्या बात है