Tuesday, October 1, 2013

दोस्त

लोग मन्जिल को मुश्किल समझते है,
हम मुश्किल को मन्जिल समझते है,
बडा फरक है लोगो मे ओर हम मै,
लोग जिन्दगी को दोस्त ओर हम दोस्त
को जिन्दगी समझते है.
आदते अलग हे हमारी दुनिया वालो से,
कम दोस्त रखते हे मगर लाजवाब रखते है-
क्योंकि बेशक हमारी माला छोटी है-
पर फूल उसमे सारे गुलाब रखते हे..

Sunday, September 8, 2013

मुस्कराता

मुस्कराता हाथ मलता सोचता रहता हूँ मैं 
साथ चलती जिंदगी से क्यूँ खफा रहता हूँ मैं 

आएगा इकदिन ज़माना संजीदा रहता हूँ मैं   
धूप बारिश सब भुलाकर बस डटा रहता हूँ मैं  

आँधियों में भी गिरा हूँ, धूप में भी मैं जला 
ख़्वाब जो हरदम सुहाना देखता रहता हूँ मैं 

हाले दिल कैसा होगा जब होगा उनसे सामना
राह चलते दिल ही दिल में पूछता रहता हूँ मैं

आबरू जम्हूरियत की रहनुमा सब ले उड़े 
बेसहारा मुल्क लेकर चीखता रहता हूँ मैं  

मैं जो हुआ घायल तो आएं लोग मुझको देखने 
टूटने के बाद भी क्या आईना रहता हूँ मैं 

जिंदगी हसीं है -

जिंदगी हसीं है -
"खाने के लिए ज्ञान पचाने के लिए विज्ञान, सोने के लिए फर्श पहनने के लिए आदर्श, जीने के लिए सपने चलने के लिए इरादे, हंसने के लिए दर्द लिखने के लिए यादें... न कोई शिकायत न कोई कमी है, एक शायर की जिंदगी यूँ ही हसीं है... "


किस किस की दास्ताँ सुनोगे तुम " रीतेश "
इस जमाने के  अन्दर तो  जमाने  बहुत हैं

Sunday, July 14, 2013

अक्सर जब में और मेरी तन्हाई

अक्सर जब में और मेरी तन्हाई

साथ होते है

खुले आँगन के नीचे

तुम्हारी साये में बैठ

तुम्हारी ही बाते करते है

तुम असमान से मुझे

बाँहे फैलाये मुझे पुकारती हो

में जमीन में खड़ा

अल्पक तुम्हारी ओर

बेबसी से निहारता रहता हु

और सोचता हु क्या

एक असमान में रहने वाला

कभी

जमीं पर उतर सकता है

या जमीन की ये

काया असमान

के उस सितारों

की बांहों में

खो सकती है

--------- अक्सर जब में

----------------------------रितेश पाण्डेय

अक्सर जब में और मेरी तन्हाई

अक्सर जब में और मेरी तन्हाई

साथ होते है

खुले आँगन के नीचे

तुम्हारी साये में बैठ

तुम्हारी ही बाते करते है

तुम असमान से मुझे

बाँहे फैलाये मुझे पुकारती हो

में जमीन में खड़ा

अल्पक तुम्हारी ओर

बेबसी से निहारता रहता हु

और सोचता हु क्या

एक असमान में रहने वाला

कभी

जमीं पर उतर सकता है

या जमीन की ये

काया असमान

के उस सितारों

की बांहों में

खो सकती है

--------- अक्सर जब में

----------------------------रितेश पाण्डेय

ना सरोवर, ना नदिया

ना सरोवर, ना नदिया, ना सागर बनना है।

सीप में मोती पलते हैं

सीप में मोती पलते हैं ज्यूँ , रख सीने में दर्द सजाकर

सीप में मोती पलते हैं ज्यूँ , रख सीने में दर्द सजाकर
रुसवा अपना प्यार न करना, पागल अपने अश्क बहा कर
घोर निराशा के अंधियारे, घेरें जब-जब तुझको, ऐ दिल
रौशन राहें कर ले अपनी, आशाओं की शम्मा जला कर
आँसू एक न ज़ाया करना, ये दौलत अनमोल है प्यारे
दिल के जख़्मों को सीना है, इस पानी को तार बनाकर
श्रद्धा और विश्वास ही तो हैं, इन्सानी जीवन के जौहर
मूँद के अपनी आँखे बंदे, प्रीतम का दीदार किया कर
नूर उसी इक रब का  हम दोनों के अंदर बसता
देख ख़ुदा को मन ही मन में, क्या करना है बाहर जाकर???

Sunday, April 14, 2013

ज़िंदगी में आपका मुझ पर बहुत एहसान है

ज़िंदगी में आपका मुझ पर बहुत एहसान है

आपकी सूरत हमेशा आँख की मेहमान है

आप न होते तो मेरी ज़िंदगी बेनूर थी

आपसा न और कोई  नेकदिल इंसान है

मैं पड़ा था धूल में ठोकर सभीकी खा रहा

यूँ तराशा आपने हीरों में अब पहचान है

है खुदा कैसा कभी देखा नहीं है आँख से

पर लगे है आपके रुख पर खुदा की शान है

आपके नक्शे-कदम पर ही चलूँ मैं उम्र भर

है तमन्ना ये " रितेश "  न और कुछ अरमान है.

जिंदगी बनाने के लिए, घर से दूर निकल आया हूँ,


जिंदगी बनाने के लिए, घर से दूर निकल आया हूँ,
सपनो को पाने की चाहत में, अपनों को दूर छोड़ आया हूँ,


सुख साधन कितने ही समेट लूं, मेरा घर आज भी याद आता है,
चाहूं तो सारी दुनिया को नाप लूं, आखिर में माँ के हाथ का खाना याद आता है,


बीमार जब होता हूँ तो इलाज तो मिल जाता है,
पर जब दावा न काम आती तो माँ का दुलार याद आता है,



अब तो बस कोसता हूँ अपने आप को, की क्या करने चला आया हूँ,
जिंदगी बनाना चाहता था " रितेश " मैं और जिंदगी से ही दूर चला आया हूँ....