Sunday, July 14, 2013

अक्सर जब में और मेरी तन्हाई

अक्सर जब में और मेरी तन्हाई

साथ होते है

खुले आँगन के नीचे

तुम्हारी साये में बैठ

तुम्हारी ही बाते करते है

तुम असमान से मुझे

बाँहे फैलाये मुझे पुकारती हो

में जमीन में खड़ा

अल्पक तुम्हारी ओर

बेबसी से निहारता रहता हु

और सोचता हु क्या

एक असमान में रहने वाला

कभी

जमीं पर उतर सकता है

या जमीन की ये

काया असमान

के उस सितारों

की बांहों में

खो सकती है

--------- अक्सर जब में

----------------------------रितेश पाण्डेय

अक्सर जब में और मेरी तन्हाई

अक्सर जब में और मेरी तन्हाई

साथ होते है

खुले आँगन के नीचे

तुम्हारी साये में बैठ

तुम्हारी ही बाते करते है

तुम असमान से मुझे

बाँहे फैलाये मुझे पुकारती हो

में जमीन में खड़ा

अल्पक तुम्हारी ओर

बेबसी से निहारता रहता हु

और सोचता हु क्या

एक असमान में रहने वाला

कभी

जमीं पर उतर सकता है

या जमीन की ये

काया असमान

के उस सितारों

की बांहों में

खो सकती है

--------- अक्सर जब में

----------------------------रितेश पाण्डेय

ना सरोवर, ना नदिया

ना सरोवर, ना नदिया, ना सागर बनना है।

सीप में मोती पलते हैं

सीप में मोती पलते हैं ज्यूँ , रख सीने में दर्द सजाकर

सीप में मोती पलते हैं ज्यूँ , रख सीने में दर्द सजाकर
रुसवा अपना प्यार न करना, पागल अपने अश्क बहा कर
घोर निराशा के अंधियारे, घेरें जब-जब तुझको, ऐ दिल
रौशन राहें कर ले अपनी, आशाओं की शम्मा जला कर
आँसू एक न ज़ाया करना, ये दौलत अनमोल है प्यारे
दिल के जख़्मों को सीना है, इस पानी को तार बनाकर
श्रद्धा और विश्वास ही तो हैं, इन्सानी जीवन के जौहर
मूँद के अपनी आँखे बंदे, प्रीतम का दीदार किया कर
नूर उसी इक रब का  हम दोनों के अंदर बसता
देख ख़ुदा को मन ही मन में, क्या करना है बाहर जाकर???