Monday, November 29, 2010

सत्य के लिए तुम न अब.. लड़ा करो


सत्य के लिए तुम न अब.. लड़ा करो
मत मोढो घुटने ,चादर को बढ़ा. करो

तुम्हे क्या दिया. सिद्धांत और धर्म ने अपने कायदे दूसरों पर मत मढ़ा करो

सत्य..... परेशान होता,पराजित नही .. खोखली बातों के लिए मत अड़ा करो

यूँ तो जिन्दगी भर.. नही तोड़ पाओगे मटकी, तुम किसी के कंधे पे चढ़ा करो

पास होने की सिर्फ अंकसूची भर चाहिए .. कैसे पास हुए सवाल यह मत खड़ा करो

दूसरों के लिए लढना रोना छोड़ दो अब जीना है तो दिल अपना भी कड़ा करो

बहुमत के साथ चलना सीख लों ,"रितेश" बे- फायदे की बहस में ..मत पड़ा करो

Wednesday, November 3, 2010

मैं अकथ्य को कहने का अभ्यास कर रहा हूं।


मैं अकथ्य को कहने का अभ्यास कर रहा हूं। नए कोर्स की कठिन परीक्षा पास कर रहा हूं। हूक उठे मन में तो उस पर काबू पा लेता, यादें तंग करें तो आंखों को रिसने देता, लोगों से मिलता हूं मस्ती की मुद्राओं में भीतर पूरा कवि हूं, बाहर पूरा अभिनेता, जल में हिम-सा बहने का अभ्यास कर रहा हूं। आंसू पी न सकूं, निर्जल-उपवास कर रहा हूं। निपट अकेले रोने से जी हल्का होता है, कोई नहीं पूछने-वाला तू क्यों रोता है, ये, वे पल हैं, जो नितान्त मेरे-अपने पल हैं यहां मौन ही अब मेरी कविता का श्रोता है, घर से बाहर रहने का अभ्यास कर रहा हूं। ऐसा लगता है, जैसे कुछ खास कर रहा हूं। दीवारों में रहता हूं, घर में वनचारी हूं, अब मैं सचमुच ऋषि कहलाने का अधिकारी हूं, मेरे सर-पर-का बोझा जो लूट ले गया है मैं अपने अंतरतम से उसका आभारी हूं, " रितेश " दुख को, सुख से सहने का अभ्यास कर रहा है । सागर-डूबी धरती को आकाश कर रहा हूँ।..!!!!!