Sunday, April 14, 2013

ज़िंदगी में आपका मुझ पर बहुत एहसान है

ज़िंदगी में आपका मुझ पर बहुत एहसान है

आपकी सूरत हमेशा आँख की मेहमान है

आप न होते तो मेरी ज़िंदगी बेनूर थी

आपसा न और कोई  नेकदिल इंसान है

मैं पड़ा था धूल में ठोकर सभीकी खा रहा

यूँ तराशा आपने हीरों में अब पहचान है

है खुदा कैसा कभी देखा नहीं है आँख से

पर लगे है आपके रुख पर खुदा की शान है

आपके नक्शे-कदम पर ही चलूँ मैं उम्र भर

है तमन्ना ये " रितेश "  न और कुछ अरमान है.

जिंदगी बनाने के लिए, घर से दूर निकल आया हूँ,


जिंदगी बनाने के लिए, घर से दूर निकल आया हूँ,
सपनो को पाने की चाहत में, अपनों को दूर छोड़ आया हूँ,


सुख साधन कितने ही समेट लूं, मेरा घर आज भी याद आता है,
चाहूं तो सारी दुनिया को नाप लूं, आखिर में माँ के हाथ का खाना याद आता है,


बीमार जब होता हूँ तो इलाज तो मिल जाता है,
पर जब दावा न काम आती तो माँ का दुलार याद आता है,



अब तो बस कोसता हूँ अपने आप को, की क्या करने चला आया हूँ,
जिंदगी बनाना चाहता था " रितेश " मैं और जिंदगी से ही दूर चला आया हूँ....