Monday, July 19, 2010

बड़ी बात है


द्वन्द्व को पार करना बड़ी बात है अपने दुख से उबरना बड़ी बात है
जंगलों-जंगलों, पर्वतों-पर्वतों गंध बनकर बिखरना बड़ी बात है

रूप में अपनी परछाई को देखकर दर्पनों का सँवरना बड़ी बात है

लोग नासूर कह कर डराने लगे उन दिनों, घाव भरना बड़ी बात है
अपने आतंक के राज्य को त्याग कर सिरफिरों का सुधरना बड़ी बात है
शेर सुन कर समझने का दावा कर शायरी में उतरना बड़ी बात है
" रितेश " कहते है अपनी सीमा को पहचान कर भी कभी अपनी हद से आगे गुज़रना बहुत बड़ी बात है.

Sunday, July 18, 2010

चाँद उतरा


जब मेरा हर ज़ख़्म गहरा हो गया दर्द से पुरनूर चेहरा हो गया एक क़तरे का करिश्मा देखिए इस कदर तड़पा के दरिया हो गया शाम के काँधे पे सूरज क्या झुका सारी दुनिया में अँधेरा हो गया चाँद उतरा जब हमारे सहन में चाहतों का रंग सुन्हेरा हो गया जब थके-माँदों को नींद आने लगी एक झपकी में सवेरा हो गया ज़िन्दगी ज़हरीली नागिन है इस के पीछे " रितेश " तू क्यूँ सँपेरा हो गया...

Saturday, July 3, 2010

मेरा संसार


पतझड़ हो गया मेरा संसार जब से तूने छोड़ दिया है साथ ना जाने क्या भूल हुई जब से तू है गई मेरी जिंदगी मुझसे दूर हुई तेरे बगैर सब कुछ अधूरा है ये गाँव , घर, ये आँगन ये नदी का किनारा, वो बगीचा अब इस आम पर कोयल नहीं आती उसका वो मधुर कलरव चीख बन गया है अब जब से तू है गई ... बगिया में नहीं खिला कोई गुलाब माटी की वो सौंधी खूशबू कहाँ खो गई तेरे जाने से खुशियाँ मुझसे जुदा हो गई अब नहीं बजती मंदिर में घंटियाँ सुनाई देती है हर जगह दर्द की चीख हर कोई दुखी है मेरे दर्द में और ना सता, अब आजा तू बन के बहार उड़ेल दे आँचल से मेरे जीवन में प्यार कर फिर से वो सोलह श्रृंगार कि आ जाए फिजाओं में बहार बुला ले उस कोयल को जो मधुर गीत है गाती रख दे '' रितेश '' की आँखों पे हथेली आजा सामने तू हँसती मुस्कुराती।