'' रितेश ''प्यार को प्यार से अब एक हसीं मोड़ दो आज रात, मेरे जिस्म में अपनी रूह छोड़ दो !
परवाह न करो,मान लो मेरे इकरार की जि़द हर रस्म और हर कसम आज सब तोड़ दो !
फिर मिले न मिले.क्या भरोसा ओ मेरे सनम आज मेरे बदन में तुम कोई. निशानी छोड़ दो !
जितने प्यासे हो तुम उतने ही प्यासे.. है हम कोरी चादर पे सुहाग का सिन्दूरी रंग छोड़ दो !
तन मन और जीवन सब है तुम्हारे हवाले.अब सोलह सावन से कुवांरी. साँसों का व्रत तोड़ दो !
दो बदन यूँ मिले,अब साँसों का भी फासला न हो आगोश में छुपा लो, इक रूह से दो बदन जोड़ दो
झुमके- कंगन, चुढ़ी पायल यह तो जेवर हें बस गहना अनमोल तो नथ है लो इसे भी तोड़.. दो !
सजन तुम्हारी वासना मेरी जन्मो की है उपासना स्वीकार कर के मुझे प्रेम की समाधि से जोड़ दो !
आत्मा से लिए हमने सात फेरे और सातों वचन घर की देहलीज पर शगुन का ''रितेश ''श्री -फल फोड़ दो
दुनिया के रास्ते मे कहाँ खो गये ऐसे जब जब खुद के रास्ते बनाने निकले || ले चिराग रौशनी बन बैठे दूर तक खुद क्या पता जब रौशनी ही बुझाने निकले || ना दरिया का पता था ना समुंदर का जब जब राहे चमन को सजाने निकले || फकत इतना ही रहा जो अफ़सोस रहेगा आग थी चाँद पर जमीं पर बुझाने निकले || रोता हूँ आज भी तेरे प्यार मे ऐ "आरती " तेरे प्यार के किस्से माकूल सुनाने निकले || डूब गये चाँद सितारे इस कदर से देखो '' रितेश '' की लाश भी मिली नही अस्थियाँ बहाने निकले ||
लहरों ..मुझे ले चलों ... बीच मंझधार .. मैं फिर ...लौट के न आऊ इस पार किनारा बन तुम - रहना सुदृढ़ ...सदा स्थिर और स्थित दूर से निहारूंगा तुम्हें मैं हिचकोले खाता खारे जल सा बिन नाव ..बिन पतवार चाहा था बस मैंने तुमसे कुछ मीठे बोल और पुरवाई संग घुला तुम्हारा शीतल प्यार इतना भी न मिल सका मुझे बन गया थपेड़ो कों सहता मेरा जीवन स्वयं एक भार अब मेरे भटकते आशान्त मन कों सह रहा ....यह भीषण पारावार सोचता शांत चित्त हो जाऊ पर एक तिनका तक न मिलता मुझे बह रहा व्यर्थ ही मैं वक्त का यह कैसा -निर्मम प्रहार लहरों ..'' रितेश '' को ले चलों ... बीच मंझधार .. मैं फिर ...लौट के न आऊ इस पार
मेरे घर के बहार नीम के पेड़ की पत्तियां लहरा रहीं है सम्वेदनाओ की भाषा में वे मुझको बहला रही हैं ,कहती हैं कुछ देर आओ इस मातृत्व की छायाँ में समां जाओ हमारे पुत्र पुत्रियाँ तो जाने कहाँ होंगे तुम तो सामने हो ,कुछ देर हमें भी गले लगा जाओ इतने प्रेम को में नकार न सका किसी और को में पुकार न सका ली चारपाई और उसके आगोश में समां गया कड़ी धुप थी पर मुझपर उसके प्रेम का साया छ गया ..तुम भी देख लो इधर उधर कोई तुम्हे भी बुला रहा है में तो आनंद ले रहा हूँ ,विनती है ''रितेश'' का आप भी आनंद लें ....
बात चली तेरी आँखों से, जा पहुंची पैमाने तक,खींच रही है तेरी उल्फत, आज मुझे मैखाने तक,इश्क कि बातें, गम कि बातें, दुनिया वाले करते हैं,किसने शम्मा का दुःख देखा, कौन गया परवाने तक,इश्क नहीं है तुमको मुझ से सिर्फ बहाने करती हो,यूँ ही बहाने कायम रखना, तुम मेरे मर जाने तक,इतना ही कहना है '' रितेश '' का तुमसे मुमकिन हो तो, आ जाना आ ही गए तो रुकना होगा, आँखों के पथराने तक..
मैं हर दूसरे छण उनको एक पत्र लिखता हूं मगर सभी कागज पर नहीं उतरते, सच , यह मेरी बड़ी से बड़ी पीड़ा है
कि जिनको मैं अतिशय प्रेम करता हूं वो इसी कारण ''रितेश'' को पागल समझते है!
कदम कदम पर बहारो ने साथ छोड दिया, पडा जब वक़्त तो अपनो ने साथ छोड दिया, कसम खाई थी इन सितारो ने, साथ देने की, सुबह होते ही सितारो ने भी साथ छोड दिया,
पीने बैठा हूँ ,पीये जा रहा हूँ ... न कोई मकसद है न इरादा है .... जब याद तेरी आई तो इतना होश कहाँ कि कम है कि ज्यादा है.
मुझे मौत तो न मिटा सकी पर ज़िन्दगी ने हरा दिया मुझे जीते जी ही मौत का अहसास तुम ने करा दिया मेरे ख्वाब के जो महल थे मैं चला था उन की तलाश में मैंने राह-ए-मन्ज़िल छोड़ दी कि हकीकतों ने डरा दिया तुम भूल गये मेरे प्यार को मुझे ये ही गम कुछ कम न था रुसवाई से तुम्हें क्या मिला मुझे क्यों नज़र से गिरा दिया ज़फ़ाओं की फ़हरिस्त भी मेरे यार की कुछ कम नहीं उस ने मेरी वफ़ाओं का ईनाम कैसा खरा दिया '' रितेश ''ऐ वक्त यूं तो उम्र भर तड़पा करेगा मेरा दिल दुनिया की नज़रों में खलिश मेरा ज़ख्म तूने भरा दिया.
मुझे मौत तो न मिटा सकी पर ज़िन्दगी ने हरा दिया मुझे जीते जी ही मौत का अहसास तुम ने करा दिया
मेरे ख्वाब के जो महल थे मैं चला था उन की तलाश में मैंने राह-ए-मन्ज़िल छोड़ दी कि हकीकतों ने डरा दिया
तुम भूल गये मेरे प्यार को मुझे ये ही गम कुछ कम न था रुसवाई से तुम्हें क्या मिला मुझे क्यों नज़र से गिरा दिया
ज़फ़ाओं की फ़हरिस्त भी मेरे यार की कुछ कम नहीं उस ने मेरी वफ़ाओं का ईनाम कैसा खरा दिया
'' रितेश '' का ऐ वक्त यूं तो उम्र भर तड़पा करेगा मेरा दिल दुनिया की नज़रों में खलिश मेरा ज़ख्म तूने भरा दिया.
जो हमसे पहले आये थे अब वो ही बाशिंदें नही रहेमेरे गाँव शहर में अब परिंदे नही रहेआदम जात की फितरतों ने घोल दिया हवाओं में जहर मेरे पितरो (पितृ देवता )के पुरखे पीपल और बरगद भी जिन्दा नही रहे हर अमावस और उनकी तिथियों पर देता हु नियमित अर्ध्य उस जल में भी अमृत तत्व शेष नही रहे .. अब बेमानी रूडिवादी लगती है वट वृक्ष की पूजा अब तुलसी वाले आँगन ही नही रहे . गो धूलि बेला में पनिहारिनों के लोकगीत सुनाई नही पढ़ते पनघट ..पर अब परियों के जमघट नही रहे मल्लाह का आलाप सुनने को तरसते है कान .. कंहा है ..अब ग्वाले की ? ठेठ देशी तान वो सावन के झूले ..वो साँझा चूल्हे रात भर आती मंदिर से ढोलक हारमोनियम के स्वर गम्मत(भजन मंडली ) वाले भी '' रितेश '' कंहा रहे
क्यूँ है ख़ामोश समंदर तुम्हें मा’लूम है क्या कितने तूफ़ान हैं भीतर तुम्हें मा’लूम है क्या
उससे मिलने की तमन्ना है अगर मिल जाए कौन लिखता है मुक़द्दर तुम्हें मा’लूम है क्या
एक जुमला वो जो कल तुमने कहा था, उसने
ख़ून से रँग दिए ख़ंजर तुम्हें मा’लूम है क्या
दर्द कितना भी दो आँसू नहीं आने वाले दिल मेरा हो गया पत्थर तुम्हें मा’लूम है क्या
डूब जाता है उन आँखों में उतरने वाला उसकी आँखें हैं समंदर तुम्हें मा’लूम है क्या
हम दिखावे की मुहब्बत नहीं करते तुमसे जान कर देंगे निछावर ''रितेश '' मा’लूम है क्या
हर रात एक नाम याद आता है कभी सुबह कभी शाम याद आता है, जब सोचता हूँ कर लू दूसरी मोहब्बत फ़िर पहली मोहब्बत का अंजाम याद आता है!सजा मिली है उनसें दूर रहने की ये बात नही है किसी और से कहने की, हम तो रह लेंगे उनके बिना भी,पर इन आशुओ को आदत है,उनकी याद में बहने की!साथ छोड़ के कभी हमसे जुदा मत होना वफ़ा चाहिए तुमसे,बेवफा मत होना, रूठे चाहे सारी दुनियाँ हमसे,पर दोस्त तुम कभी खफ़ा मत होना!रोयेंगी ये आँखे मुस्कराने के बाद आएगी रात दिन ढल जाने के बाद, कभी रूठना ना मुझसे मेरे दोस्त शायद ये जिन्दगी ना रहे तेरे रूठ जाने के बाद!रह-रह के उनकी याद सताए तो क्या करे उनकी याद दिल से ना जाए तो क्या करे, सोचा था ख्वाबों में मुलाकात होगी,लेकिन ''रितेश''जब नींद ही ना आए तो क्या करे!
कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखू या सापनो की सौगात लिखूँ ॰॰॰॰॰॰मै खिलता सुरज आज लिखू या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ ॰॰॰॰॰॰वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सान्स लिखूँवो पल मे बीते साल लिखू या सादियो लम्बी रात लिखूँमै तुमको अपने पास लिखू या दूरी का ऐहसास लिखूँमै अन्धे के दिन मै झाँकू या आँन्खो की मै रात लिखूँमीरा की पायल को सुन लुँ या गौतम की मुस्कान लिखूँबचपन मे बच्चौ से खेलूँ या जीवन की ढलती शाम लिखूँसागर सा गहरा हो जाॐ या अम्बर का विस्तार लिखूँवो पहली -पाहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँसावन कि बारिश मेँ भीगूँ या आन्खो की मै बरसात लिखूँगीता का अॅजुन हो जाॐ या लकां रावन राम लिखूँ॰॰॰॰॰मै हिन्दू मुस्लिम हो जाॐ या बेबस ईन्सान लिखूँ॰॰॰॰॰मै ऎक ही मजहब को जी लुँ ॰॰॰या मजहब की आन्खे चार लिखूँ॰॰॰कुछ जीत लिखू या हार लिखूँ '' रितेश ''या दिल का सारा प्यार लिखूँ
शहर की इस दौड में दौड के करना क्या है?अगर यही जीना हैं दोस्तों... तो फिर मरना क्या हैं?पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िकर हैं......भूल गये भींगते हुए टहलना क्या हैं.......सीरियल के सारे किरदारो के हाल हैं मालुम......पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुरसत कहाँ हैं!!!!!!अब रेत पर नंगे पैर टहलते क्यों नहीं........१०८ चैनल हैं पर दिल बहलते क्यों नहीं!!!!!!!इंटरनेट पे सारी दुनिया से तो टच में हैं.......लेकिन पडोस में कौन रहता हैं जानते तक नहीं!!!!मोबाईल, लैंडलाईन सब की भरमार हैं.........लेकिन ज़िगरी दोस्त तक पहुंचे ऐसे तार कहाँ हैं!!!!कब डूबते हुए सूरज को देखा था याद हैं??????कब जाना था वो शाम का गुजरना क्या हैं!!!!!!!तो दोस्तो इस शहर की दौड में दौड के करना क्या हैं??????अगर यही जीना हैं तो फिर '' रितेश '' मरना क्या हैं!!!!!!!!
जलते रहे जिनके लिए हम रौशनी बनकरवो शख्स भी मिला मुझे तो अजनबी बनकरफरेब जब भी पाया तो पाया है आशनाई मेकभी वफा बनकर तो कभी दोस्ती बनकरता-उमर समझते रहे जिसे हमसफ़र अपनावो मौत भी बेवफाई कर गयी जिन्दगी बनकरमंसब नशीन हुए लोग हिन्दू-मुसलमान बनकेमै तो कही का ना रहा" रितेश "आदमी बनकर
कल रात मेने अपने सारे गम आसमान को सुना दिए,
आज मैं चुप हूँ और आसमान रो रहा है .... शुभरात्रि