Monday, June 14, 2010

बीच मंझधार


लहरों ..मुझे ले चलों ... बीच मंझधार .. मैं फिर ...लौट के न आऊ इस पार किनारा बन तुम - रहना सुदृढ़ ...सदा स्थिर और स्थित दूर से निहारूंगा तुम्हें मैं हिचकोले खाता खारे जल सा बिन नाव ..बिन पतवार चाहा था बस मैंने तुमसे कुछ मीठे बोल और पुरवाई संग घुला तुम्हारा शीतल प्यार इतना भी न मिल सका मुझे बन गया थपेड़ो कों सहता मेरा जीवन स्वयं एक भार अब मेरे भटकते आशान्त मन कों सह रहा ....यह भीषण पारावार सोचता शांत चित्त हो जाऊ पर एक तिनका तक न मिलता मुझे बह रहा व्यर्थ ही मैं वक्त का यह कैसा -निर्मम प्रहार लहरों ..'' रितेश '' को ले चलों ... बीच मंझधार .. मैं फिर ...लौट के न आऊ इस पार

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