
क्यूँ है ख़ामोश समंदर तुम्हें मा’लूम है क्या कितने तूफ़ान हैं भीतर तुम्हें मा’लूम है क्या
उससे मिलने की तमन्ना है अगर मिल जाए कौन लिखता है मुक़द्दर तुम्हें मा’लूम है क्या
एक जुमला वो जो कल तुमने कहा था, उसने
ख़ून से रँग दिए ख़ंजर तुम्हें मा’लूम है क्या
दर्द कितना भी दो आँसू नहीं आने वाले दिल मेरा हो गया पत्थर तुम्हें मा’लूम है क्या
डूब जाता है उन आँखों में उतरने वाला उसकी आँखें हैं समंदर तुम्हें मा’लूम है क्या
हम दिखावे की मुहब्बत नहीं करते तुमसे जान कर देंगे निछावर ''रितेश '' मा’लूम है क्या
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