Wednesday, June 9, 2010

मेरा गाँव


जो हमसे पहले आये थे अब वो ही बाशिंदें नही रहे
मेरे गाँव शहर में अब परिंदे नही रहे
आदम जात की फितरतों ने घोल दिया हवाओं में जहर मेरे पितरो (पितृ देवता )के पुरखे पीपल और बरगद भी जिन्दा नही रहे हर अमावस और उनकी तिथियों पर देता हु नियमित अर्ध्य उस जल में भी अमृत तत्व शेष नही रहे .. अब बेमानी रूडिवादी लगती है वट वृक्ष की पूजा अब तुलसी वाले आँगन ही नही रहे . गो धूलि बेला में पनिहारिनों के लोकगीत सुनाई नही पढ़ते पनघट ..पर अब परियों के जमघट नही रहे मल्लाह का आलाप सुनने को तरसते है कान .. कंहा है ..अब ग्वाले की ? ठेठ देशी तान वो सावन के झूले ..वो साँझा चूल्हे रात भर आती मंदिर से ढोलक हारमोनियम के स्वर गम्मत(भजन मंडली ) वाले भी '' रितेश '' कंहा रहे

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