
मुझे नहीं आता कोरे स्वप्न सजाना,
मैं अपने मन की देखी साकार करूंगा.
माना यह,हर एक कल्पना सत्य न होती,
हर अभिलाषा पूरी हो पाती कब है ?
चारो ओर अबरोध खड़े है भांति भांति के,
हर पगडण्डी मंजिल तक जाती कब है ?
लेकिन " रितेश " को नहीं आता आधे में रुक जाना,
निकल पड़ा हूँ तो आसा है की बाधाये पार कर ही लूँगा.