Monday, December 6, 2010

मुझे नहीं आता कोरे स्वप्न सजाना,


मुझे नहीं आता कोरे स्वप्न सजाना,
मैं अपने मन की देखी साकार करूंगा.

माना यह,हर एक कल्पना सत्य न होती,

हर अभिलाषा पूरी हो पाती कब है ?

चारो ओर अबरोध खड़े है भांति भांति के,
हर पगडण्डी मंजिल तक जाती कब है ?


लेकिन
"
रितेश " को नहीं आता आधे में रुक जाना,
निकल पड़ा हूँ तो आसा है की बाधाये पार कर ही लूँगा.