Sunday, July 14, 2013

अक्सर जब में और मेरी तन्हाई

अक्सर जब में और मेरी तन्हाई

साथ होते है

खुले आँगन के नीचे

तुम्हारी साये में बैठ

तुम्हारी ही बाते करते है

तुम असमान से मुझे

बाँहे फैलाये मुझे पुकारती हो

में जमीन में खड़ा

अल्पक तुम्हारी ओर

बेबसी से निहारता रहता हु

और सोचता हु क्या

एक असमान में रहने वाला

कभी

जमीं पर उतर सकता है

या जमीन की ये

काया असमान

के उस सितारों

की बांहों में

खो सकती है

--------- अक्सर जब में

----------------------------रितेश पाण्डेय

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