
"आवाज़ जो खोई थी कल ही आज फिर से गूंजती है पूछती है प्यार से कैसी है दुनिया ? शब्द जड़ हों चेतना जब बह चली हो वख्त की बहती नदी मैं याद की नावें परिंदे स्वप्न जैसे उड़ चले हैं श्राद्ध और श्रद्धा के इन प्रसंगों की परिधि में वेदना और चेतना की व्याख्या बेचैन करती है वह चेतना तुमको तो लौटाऊँगा नहीं जो दे गए थे तुम मुझे चेतना और वेदना के बीच का विस्तार मेरी मुट्ठी से रपटती रेत जैसा वख्त है जिसमें कहीं तुम खो गए थे मैं भी आता हूँ अभी कुछ काम बाकी हैं मैं भी आता हूँ अभी कुछ रंजिशें कुछ राग बाकी हैं मैं आऊँगा रुके रहना अभी मेरे कुछ और इम्तहान बाकी हैं."
No comments:
Post a Comment