
"पिघ..लता था जब साँझ का संदली बदन..
छू कर निकलती थी जब मुझे आवारा पवन
जाने किसके स्पर्श का आकांशी हो उठता था मेरा मन..
मिलने पर तुम्हारे, लगा...
तुम ही हो वो शीतल घन...
जिसका बरसों से आकांशी था
मेरा मन..." रितेश "
छू कर निकलती थी जब मुझे आवारा पवन
जाने किसके स्पर्श का आकांशी हो उठता था मेरा मन..
मिलने पर तुम्हारे, लगा...
तुम ही हो वो शीतल घन...
जिसका बरसों से आकांशी था
मेरा मन..." रितेश "
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