Sunday, July 18, 2010

चाँद उतरा


जब मेरा हर ज़ख़्म गहरा हो गया दर्द से पुरनूर चेहरा हो गया एक क़तरे का करिश्मा देखिए इस कदर तड़पा के दरिया हो गया शाम के काँधे पे सूरज क्या झुका सारी दुनिया में अँधेरा हो गया चाँद उतरा जब हमारे सहन में चाहतों का रंग सुन्हेरा हो गया जब थके-माँदों को नींद आने लगी एक झपकी में सवेरा हो गया ज़िन्दगी ज़हरीली नागिन है इस के पीछे " रितेश " तू क्यूँ सँपेरा हो गया...

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