Saturday, July 3, 2010

मेरा संसार


पतझड़ हो गया मेरा संसार जब से तूने छोड़ दिया है साथ ना जाने क्या भूल हुई जब से तू है गई मेरी जिंदगी मुझसे दूर हुई तेरे बगैर सब कुछ अधूरा है ये गाँव , घर, ये आँगन ये नदी का किनारा, वो बगीचा अब इस आम पर कोयल नहीं आती उसका वो मधुर कलरव चीख बन गया है अब जब से तू है गई ... बगिया में नहीं खिला कोई गुलाब माटी की वो सौंधी खूशबू कहाँ खो गई तेरे जाने से खुशियाँ मुझसे जुदा हो गई अब नहीं बजती मंदिर में घंटियाँ सुनाई देती है हर जगह दर्द की चीख हर कोई दुखी है मेरे दर्द में और ना सता, अब आजा तू बन के बहार उड़ेल दे आँचल से मेरे जीवन में प्यार कर फिर से वो सोलह श्रृंगार कि आ जाए फिजाओं में बहार बुला ले उस कोयल को जो मधुर गीत है गाती रख दे '' रितेश '' की आँखों पे हथेली आजा सामने तू हँसती मुस्कुराती।

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