
दुनिया के रास्ते मे कहाँ खो गये ऐसे जब जब खुद के रास्ते बनाने निकले || ले चिराग रौशनी बन बैठे दूर तक खुद क्या पता जब रौशनी ही बुझाने निकले || ना दरिया का पता था ना समुंदर का जब जब राहे चमन को सजाने निकले || फकत इतना ही रहा जो अफ़सोस रहेगा आग थी चाँद पर जमीं पर बुझाने निकले || रोता हूँ आज भी तेरे प्यार मे ऐ "आरती " तेरे प्यार के किस्से माकूल सुनाने निकले || डूब गये चाँद सितारे इस कदर से देखो '' रितेश '' की लाश भी मिली नही अस्थियाँ बहाने निकले ||
जब फोटो तथा कविता पोस्ट करें तो उसे centralise कर लें. और हां गजल मे बुतों का नाम नहीं लिया करते.
ReplyDeleteसत्य